समझ

इस जहाँ को प्रकृति ने इतना खूबसूरत बनाया है पर इंसान ने या तो अधूरी शिक्षा से या फिर स्वार्थ पूर्ति के कारण इसका सत्यानाश कर दिया है।शिक्षा भले उच्च स्तर की हो पर इंसान बहुत सारे मौको पर निम्न स्तर का व्यवहार करने से भी नही कतराता।इस मसले को यूं समझे कि जब जहां जैसी जरूरत होती है वैसा अभिनय इंसान कर लेता है।रिश्तों को सहेजने को या बनाने की या निभाने की बात हो,जब चाहे उस तरह से इंसान रिश्तों को तवज्जों देने लग जाता है।जो रिश्ते कभी बेहतर होते है वो कुछ समय मे इतने निम्न कोटि के घोषित कर दिए जाते है जहां सुनकर भी हैरानी होती है।शिक्षा का ऐसा हश्र तो ज्ञात इतिहास में पता करना मुश्किल हो चला है।

आज का दौर डरावना लगता है इसके पीछे का कारण मनुष्य की शिक्षा मे ही कमी नही है इसका मूल कारण है बदलते विचार,स्वार्थपूर्ति और तत्काल परिणाम।प्रकृति ने ऐसे जग में जन्म दिया है जहां खुशियों से सराबोर हो जाना हर पल मुनासिब है लेकिन खान पान,आचार विचार ने देश काल परिस्थितियों को इतना बदल कर रख दिया है कि कोई भी इसे समझ नही पा रहा न ही इसके बदलने की कोई समझ रख पाने में संभव होता प्रतीत हो रहा है।

मेरी मित्र मण्डली के कुछ साथी है जिन्होंने वर्षों पहले जीवन विद्या शिविर का परिचय करवाया टैब मैं बड़े अफ़सोस के साथ पूछ बैठा था कि यार इस बात की भी ट्यूशन करनी पड़ेगी क्या? लेकिन बदलते दौर ने सब कुछ हवा हवाई सा कर दिखाया।वाक़ई रिश्तों को सहेजने की समझ विकसित नही हो पाई है चाहे मंगल अभियान अपने चरम पर हो।

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